देवउठनी एकादशी
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।।
भावार्थ:-वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवाई। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया।।
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीहरि चतुर्मास की निद्रा से जागते हैं। इसीलिए इस एकादशी को देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन से ही हिन्दू धर्म में शुभ कार्य जैसे, विवाह आदि शुरू हो जाएंगे।
आप सभी को जो भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मांगलिक कार्यों में सहभागिता कर रहे हैं बधाई एवं शुभकामनाएं।
शुभरात्रि🙏
मेरी ✍️से
सज्जन सिंह
25.11.2020
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