खेत थे बड़े बड़े सब बट गये, बड़ा था परिवार पर अब घट गये, सांस तक थी आस पर छूट गयी जिंदगी भी शायद हमसे रूठ गयी काल कवलित मेरे दो भाई हुये माँ बाप यादों में है समाए हुये पूर्वजों की जागीर के लिए सब जग गये, फिट फिट जमीन के लिये लड़ गये, दोष जितना सबका है उतना मेरा भी है, न बटे जमीन क्यों न हम अड़ गये। माँ के जेवर का सबको ध्यान था कर्ज का नहीं किसी को भान था। टपकती छत भूल गये,दिन कैसे गुजरे भूल गये, नया मकान याद रहा उस पर ही अभिमान रहा। मेरी ✍️से सज्जन सिंह 08.05.2023
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